logo In the service of God and humanity
Stay Connected
Follow Pujya Swamiji online to find out about His latest satsangs, travels, news, messages and more.
H.H. Pujya Swami Chidanand Saraswatiji | | Pujya Swamiji’s Message on Glaciers
35530
post-template-default,single,single-post,postid-35530,single-format-standard,edgt-core-1.0.1,ajax_fade,page_not_loaded,,hudson-ver-2.0, vertical_menu_with_scroll,smooth_scroll,side_menu_slide_from_right,blog_installed,wpb-js-composer js-comp-ver-7.5,vc_responsive

Pujya Swamiji’s Message on Glaciers

Aug 17 2022

Pujya Swamiji’s Message on Glaciers

While on an environmental pilgrimage to Iceland and Greenland this week, HH Param Pujya Swami Chidanand Saraswatiji expressed grave concern over the melting glaciers of Iceland, saying that “the retreat of the glaciers is a threat to humanity. Standing on the banks of Mother Ganga, we believed that wherever there is a glacier there should also be a journey. This journey from Ganga to Glacier and from Gomukh to Greenland and Iceland is dedicated to water conservation.”

Pujya Swamiji said that “there is scarcity of water all over the world, and that water is either getting polluted or that which is in the form of glaciers is melting in every moment. My heart aches because glaciers are melting and melting so fast, due to global warming. Glaciers in India are retreating at an average rate of 14.9-15.1 meters per year, and due to the continuous increase in air temperature, the melting of snow is accelerating, with many areas receiving rain instead of snow, which is affecting the winter-summer seasonal pattern.

“We have to wake up so that Jal Jagran becomes Jan Jagran. We must be water-conscious people. We must begin a Jal Kranti-a people’s revolution-and become Jal Abhiyan-a people’s campaign.”

ग्लेशियरों का पीछे खिसकना मानवता के लिये खतरा

ग्लेशियर टूटा तो पर्यावरण रूठा

जल है तो जीवन है

गंगा से ग्लेशियर और गोमुख से ग्रीनलैंड व आइसलैंड की यह यात्रा जल संरक्षण को समर्पित

स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश, 17 अगस्त। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आइसलैंड की घरती से पिघलते ग्लेशियरों पर चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि ग्लेशियरों का पीछे खिसकना मानवता के लिये खतरा है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमने गंगा जी के तटों को करीब से देखा हैं। गोमुख, गंगोत्री से गंगा सागर तक की यात्रा की तब लगा कि अब जहां-जहां ग्लेशियर है वहां की भी यात्रा होनी चाहिये। गंगा से ग्लेशियर और गोमुख से ग्रीनलैंड व आइसलैंड की यह यात्रा जल संरक्षण को समर्पित है।

स्वामी जी ने कहा कि पूरे विश्व में जल की कमी हो रही है, जल प्रदूषित हो रहा है और जो ग्लेशियर के रूप में हैं वह भी हर क्षण पिघल रहा हंै; हर क्षण ग्लेशियर के आकार में परिवर्तन हो रहा हैंै। ग्लेशियर पिघल-पिघल कर इतनी तीव्रता से टूट रहा है जिसके कारण मेरा हृदय भी द्रवित हो रहा है क्योंकि ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिग के कारण पिघल रहे हैं इसलिये अब जरूरत है की हम प्लास्टिक का उपयोग कम करें, जल के प्रति जागे और मिलकर कार्य करें।

भारत में ग्लेशियर 6.7, माइनस 3 मीटर प्रतिवर्ष की औसत दर से पीछे खिसक रहे है। हवा के तापमान में लगातार बढ़ोतरी होने के कारण बर्फ पिघलने में तेजी आ रही है। ग्लोबल वार्मिग और क्लाइमेंट चेंज के कारण कई बार गर्मियों में ऊँचाई वाले स्थानों पर बर्फबारी की जगह बारिश होने लगती है, जिससे सर्दी-गर्मी का मौसमी पैटर्न भी प्रभावित हो रहा है।

ग्लेशियरों के तीव्र गति से पिघलने से मानव जीवन भी प्रभावित हो रहा है। यह मृदा अपरदन, भूस्खलन और बाढ़ के कारण मिट्टी के नुकसान सहित जल, भोजन, ऊर्जा सुरक्षा एवं कृषि को भी प्रभावित कर रहा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2100 तक एशियाई हिमनदों में तकरीबन एक तिहाई की कमी हो सकती है जिससे पीने का पानी, सिंचाई तथा जल विद्युत परियोजनाएँ सबसे अधिक प्रभावित होगी।

ग्लोबल वार्मिग के कारण ग्लेशियरों में असंतुलन की स्थिति बन गई है। एशिया में एक अरब से ज्यादा लोग गंगा, यांग्त्जी और मेकांग आदि नदियों पर निर्भर हैं और इन नदियों में जल का मुख्य स्रोत हिमालय के ग्लेशियर है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग में प्रत्येक डिग्री की कमी एशियाई ग्लेशियरों की 7 प्रतिशत बर्फ को पिघलने से बचा सकती है।

स्वामी जी ने कहा कि नदियां सबकी हैं, गंगा सबकी है इसलिये हमें जल के प्रति चेतना होगा; जागना होगा ताकि जल जागरण-जन जागरण बनें। जल चेतना-जन चेतना बनें। जल क्रान्ति-जन क्रान्ति बनें और जल अभियान-जन अभियान बनें।

ग्लेशियरों के पिघलने की घटना वैश्विक स्तर पर खतरे का संकेत है। अतः जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये हमें अपनी प्रतिबद्धताओं को न केवल बढ़ाने और मजबूत करने की आवश्यकता है बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिये इन ग्लेशियरों को संरक्षित करने के प्रयासों को भी बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है।

Share Post